Saturday, 10 September 2016

श्री राम और दशरथ – अनोखा संबंध



मित्रों हम सब इस बात से भलीभांति परिचित है कि श्री राम और दशरथ

जी के बीच पिता – पुत्र का संबंध था फिर भी अनोखा संबंध ऐसा लिखने के पीछे

विशेष उद्देश्य है |

गोस्वामी जी ने जब राम चरित मानस की रचना की तब उनका उद्देश्य सिर्फ

कोई कथा सुनाना नहीं था परन्तु उस प्रसंगों के द्वारा समाज को शिक्षा प्रदान

करना भी था |

श्री राम और दशरथ जी के संबंध की कथा अनोखी है पिता और पुत्र होते

हुए भी एक श्रध्दा, भक्ति, समर्पण जो दोनों और से बराबर है |

जब मनु और शतरूपा ने अपनी कठिन तपस्या से प्रभु का दर्शन प्राप्त किया तब

भगवन ने उनको वरदान मांगने को कहा तब उन्होंने भगवान के पास उनके

समान पुत्र मांगा | अब इश्वर के समान कोई हो नहीं सकता इसलिए स्वयं

परमात्मा ही उनके घर में पुत्र के रूप में आने का वचन दिया |

उस वक़्त भगवान से मनु महाराज ने ऐसा अनुग्रह किया की है प्रभु आप के

चरणों में मेरी वैसी ही प्रीती हो जैसी पुत्र के लिए पिता की होती है | और जैसे

जल के बिना मछली नहीं रह सकती वैसे ही मेरा जीवन आप के आधीन रहे |

दशरथ का यदि अर्थ समझे तो जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को जीता है अपनी

वासनाओं को काबू में किया है वो दशरथ है | वेदों में वर्णित हमारे शरीर की

रचना अष्टचक्र एवं नौ द्वार वाली है अयोध्या नगरी की रचना भी नौ द्वार वाली

वर्णित है यह जो नौ द्वार है उसी द्वार से सारी अच्छी बुरी वासनाएं हमारे मन में

दाखिल होती है उसको काबू में रखने के लिए हमें दशरथी बनना पड़ेगा तभी

राम का अवतरण संभव बन पाएगा दशरथ जी की भक्ति की अवस्था तब

चरमसीमा पर पहुची तब फल स्वरुप श्री रामजी का अवतरण हुआ स्वामी की

प्राप्ति हुई |

इश्वर की कृपा से माता कौशल्या और दशरथ के रूप में उनका अवतरण हुआ और

प्रभु श्री राम ने माता कौशल्या की कोख को पुलकित किया गोस्वामी जी राजा

दशरथ जी की भक्ति का बड़ी सुन्दरता से वर्णन करते है जब प्रभु का अवतरण

होता है तब महाराज दशरथ के मन में ब्रह्मानंद समान आनंद मतलब जैसे भक्त

को भगवान की प्राप्ति हो और उसका मन आनंदित हो वैसी अनुभूति प्राप्त होती है

|

ठीक उसी प्रकार पुत्र के रूप में श्री राम की भक्ति करते – करते जब श्री

राम जी का राज्याभिषेक का वक्त आता है तब उनको वनवास भेजना पड़ता है

और भक्त और भगवान के विरह का वक्त आ जाता है | जैसे मणि के बिना सांप

नहीं रह सकता जैसे जल के बिना मछली नहीं रह सकती वैसे भक्त भगवान के

बिना नहीं रह सकता |

यहां गोस्वामी जी अनन्य प्रेम की बात करना चाहते है ये सारी बातों का सार

गोस्वामी जी ने प्रेम ही बताया है| जहाँ प्रेम होता है वहीं विरह की वेदना होती

है श्री राधा जी भी विरह की वेदना लेकर कृष्ण भाव में स्थित रही परन्तु

भगवान श्री राम के विरह मैं दशरथ जी की विह्व्ह्लता श्री राम के चरणों के

प्रति इतनी हो गई की श्री राम के दर्शन के बिना एक – एक क्षण भारी होने लगा

और

‘’ राम राम कहि राम कही, राम राम कही राम |

तनु परिहरी रघुबर बिरह, राउ गयउ सुरधाय ||

श्री राम राम कहकर बहुत देर तक श्री राम राम कह कर राजा श्री राम के विरह

में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गए |

श्री दशरथ जी की अप्रितम भक्ति से जीने मरने का फल तो पाया ही पर उनका

यश भी ब्रह्मांडो में छा गया |

गोस्वामी जी इस कथा से प्रेमा भक्ति की शिक्षा सिखाते है भक्ति सिर्फ

भगवान की ही नहीं उसको समाज के परिपेक्ष्य में देखा जाये तो हमारे कर्त्तव्य के

प्रति समर्पण निष्ठा, हमारे कार्य को अधिकारी समझना कर्तव्य को स्वामी

समझना और उसके प्रति समर्पण भाव और निष्ठा भाव और एकात्मता रखना

तभी समाज को सही दिशा प्राप्त हो पाएगी और ये कर्तव्य निभाने के लिए श्री

दशरथ जी की रामजी के प्रति जो भाव था उसको हमारे मन में भी हमे अवतरित

करना पड़ेगा इसी कोशिश से समाज को सच्चे राम का दर्शन हो पाएगा |

‘’जय श्री राम’’

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