Tuesday, 18 October 2016 3 comments

”स्त्री शक्ति स्वरूपा”



मित्रो, सबसे पहले में अपने विचारों के साथ कुछ लिखू उससे पहले देरी जो हुई उसकी क्षमा चाहुंगा। 

मित्रो, आज जब में समाज में चल रहे स्त्रियों के कल्याण कार्यक्रम, स्त्रियों को सशक्त बनाने की योजनायें यह सब देखता हूँ और सुनता हूँ तो आनंद जरूर होता है परंतु आश्चर्य भी होता है।

          क्यूं आज हम स्त्रियों को अबला बनाने का प्रयास करते हैं जब कि अपने आप में सबसे सामर्थ्यवान स्त्री है। स्त्री की सहज शक्ति को देखने कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। हम हमारे घर में भी हमारी माँ और बहन और पत्नी या बेटी की समर्थता, सातत्य देखकर समझ सकते हैं।

          मित्रो, हम हमारे इतिहास को देखे तो भी स्त्री की शक्ति को हम समझ सकते हैं। स्त्री की शक्ति हम सावित्री जी की बात से ठीक से समझ पायेंगे।

          जब सावित्री सत्यवान को विवाह के लिए वरण करती है तब मुनि नारद जी द्वारा उसे अवगत कराया जाता है कि ठीक एक साल के बाद सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी फिर भी अपने तप पर एवं पतिव्रत धर्म के बल पर सावित्री यमराज से अपने पति के प्राण सहित अपने घर की सुख शांति एवं समृद्धि सिर्फ अपने पति के घर की ही नहीं बल्कि पिता के घर की समृद्धि भी ले आती है।

          काल के मुंह से खींचकर जो अपने पति के प्राण ला सकती है वो स्त्री कैसे अबला हो सकती है?

          मित्रो और आगे बढ़े तो माता अनसुया अपने द्वार पर आए हुए त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश को शिशु बनाकर अपना स्तनपान कराती है और पालने में सुलाती है। त्रिदेव को मुक्त करने के बदले में समाज को गुरू दत्तात्रेय जैसे महान ज्ञानी की प्राप्ति कराती है। मित्रो आज भी जब हम माँ दुर्गा के स्वरूप को देखते है तब एक ही स्वरूप दिखता है और वो है महिषासुर मर्दीनी स्वरूप माँ के आयुध भी कल्याणकारी एवं समाज उत्थान का संदेश देने वाले हैं।

          जिस समाज में स्त्री को माँ दुर्गा स्वरूप माना जाता है ऐसी स्त्री अबला कभी नहीं हो सकती।

शक्ति तभी प्रकट होती है जब उसकी समाज को जरूरत हो। इसीलिए आज भी हमारी स्त्रियां अनेकविध क्षेत्रों में आगे बढ़ चुकी हैं।

          हमें कभी भी ये नहीं भूलना चाहिए कि श्री राम एवं श्री कृष्ण को पृथ्वी पर जन्म देने वाली भी एक स्त्री ही है। उसे अबला बनाकर कभी भी शक्ति को दबाना नहीं चाहिए।

          मित्रो हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए जब चन्ड-मुण्ड, शुम्भ निशुम्भ, रक्तबीज महिषासुर जैसे अति भयंकर राक्षसों ने देवताओं को परास्त कर दिया। 

          स्वयं भगवान विष्णुको परास्त कर दिया तब भगवती ने बाला स्वरूप घारण किया और राक्षसों का संहार किया। मित्रो यह कथा हमें आज के युग में यह ज्ञात कराती है कि जब-जब समाज ऐसे राक्षस वृति वाले लोगों को जन्म देगा तब-तब माँ भगवती स्वरूपा स्त्री तत्परता से उसका संहार करेगी।

          हमारे शास्त्रों ने भी स्त्री के स्त्रैण को उसकी अस्मीता को उसकी शक्ति को हमेशा वंदन किया है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैता न तू पूज्यन्ते सर्वत्राफलाः क्रिया।।

          स्त्री पहले भी शक्ति थी। आज भी शक्ति है और हमेशा शक्ति ही रहेगी। प्रकृति के बिना पुरूष की कल्पना हो ही नहीं सकती इसीलिए में भगवान शंकर के अर्धनारेश्वर स्वरूप को याद कराना चाहूँगा। जिन्होंने यह दर्शन कराया है कि यदि शक्ति है तभी शिव है बिना शक्ति के तो शिव भी ‘‘शवहै।

या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
‘‘यह समग्र लेख भगवती पराम्बा के चरणों में समर्पित’’



Saturday, 10 September 2016 0 comments

श्री राम और दशरथ – अनोखा संबंध



मित्रों हम सब इस बात से भलीभांति परिचित है कि श्री राम और दशरथ

जी के बीच पिता – पुत्र का संबंध था फिर भी अनोखा संबंध ऐसा लिखने के पीछे

विशेष उद्देश्य है |

गोस्वामी जी ने जब राम चरित मानस की रचना की तब उनका उद्देश्य सिर्फ

कोई कथा सुनाना नहीं था परन्तु उस प्रसंगों के द्वारा समाज को शिक्षा प्रदान

करना भी था |

श्री राम और दशरथ जी के संबंध की कथा अनोखी है पिता और पुत्र होते

हुए भी एक श्रध्दा, भक्ति, समर्पण जो दोनों और से बराबर है |

जब मनु और शतरूपा ने अपनी कठिन तपस्या से प्रभु का दर्शन प्राप्त किया तब

भगवन ने उनको वरदान मांगने को कहा तब उन्होंने भगवान के पास उनके

समान पुत्र मांगा | अब इश्वर के समान कोई हो नहीं सकता इसलिए स्वयं

परमात्मा ही उनके घर में पुत्र के रूप में आने का वचन दिया |

उस वक़्त भगवान से मनु महाराज ने ऐसा अनुग्रह किया की है प्रभु आप के

चरणों में मेरी वैसी ही प्रीती हो जैसी पुत्र के लिए पिता की होती है | और जैसे

जल के बिना मछली नहीं रह सकती वैसे ही मेरा जीवन आप के आधीन रहे |

दशरथ का यदि अर्थ समझे तो जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को जीता है अपनी

वासनाओं को काबू में किया है वो दशरथ है | वेदों में वर्णित हमारे शरीर की

रचना अष्टचक्र एवं नौ द्वार वाली है अयोध्या नगरी की रचना भी नौ द्वार वाली

वर्णित है यह जो नौ द्वार है उसी द्वार से सारी अच्छी बुरी वासनाएं हमारे मन में

दाखिल होती है उसको काबू में रखने के लिए हमें दशरथी बनना पड़ेगा तभी

राम का अवतरण संभव बन पाएगा दशरथ जी की भक्ति की अवस्था तब

चरमसीमा पर पहुची तब फल स्वरुप श्री रामजी का अवतरण हुआ स्वामी की

प्राप्ति हुई |

इश्वर की कृपा से माता कौशल्या और दशरथ के रूप में उनका अवतरण हुआ और

प्रभु श्री राम ने माता कौशल्या की कोख को पुलकित किया गोस्वामी जी राजा

दशरथ जी की भक्ति का बड़ी सुन्दरता से वर्णन करते है जब प्रभु का अवतरण

होता है तब महाराज दशरथ के मन में ब्रह्मानंद समान आनंद मतलब जैसे भक्त

को भगवान की प्राप्ति हो और उसका मन आनंदित हो वैसी अनुभूति प्राप्त होती है

|

ठीक उसी प्रकार पुत्र के रूप में श्री राम की भक्ति करते – करते जब श्री

राम जी का राज्याभिषेक का वक्त आता है तब उनको वनवास भेजना पड़ता है

और भक्त और भगवान के विरह का वक्त आ जाता है | जैसे मणि के बिना सांप

नहीं रह सकता जैसे जल के बिना मछली नहीं रह सकती वैसे भक्त भगवान के

बिना नहीं रह सकता |

यहां गोस्वामी जी अनन्य प्रेम की बात करना चाहते है ये सारी बातों का सार

गोस्वामी जी ने प्रेम ही बताया है| जहाँ प्रेम होता है वहीं विरह की वेदना होती

है श्री राधा जी भी विरह की वेदना लेकर कृष्ण भाव में स्थित रही परन्तु

भगवान श्री राम के विरह मैं दशरथ जी की विह्व्ह्लता श्री राम के चरणों के

प्रति इतनी हो गई की श्री राम के दर्शन के बिना एक – एक क्षण भारी होने लगा

और

‘’ राम राम कहि राम कही, राम राम कही राम |

तनु परिहरी रघुबर बिरह, राउ गयउ सुरधाय ||

श्री राम राम कहकर बहुत देर तक श्री राम राम कह कर राजा श्री राम के विरह

में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गए |

श्री दशरथ जी की अप्रितम भक्ति से जीने मरने का फल तो पाया ही पर उनका

यश भी ब्रह्मांडो में छा गया |

गोस्वामी जी इस कथा से प्रेमा भक्ति की शिक्षा सिखाते है भक्ति सिर्फ

भगवान की ही नहीं उसको समाज के परिपेक्ष्य में देखा जाये तो हमारे कर्त्तव्य के

प्रति समर्पण निष्ठा, हमारे कार्य को अधिकारी समझना कर्तव्य को स्वामी

समझना और उसके प्रति समर्पण भाव और निष्ठा भाव और एकात्मता रखना

तभी समाज को सही दिशा प्राप्त हो पाएगी और ये कर्तव्य निभाने के लिए श्री

दशरथ जी की रामजी के प्रति जो भाव था उसको हमारे मन में भी हमे अवतरित

करना पड़ेगा इसी कोशिश से समाज को सच्चे राम का दर्शन हो पाएगा |

‘’जय श्री राम’’
Thursday, 25 August 2016 2 comments

श्री पूर्णावतार श्री कृष्णा



मित्रों सबसे पहले पूर्ण पुरुषोत्तम श्री कृष्ण के अवतरण दिवस की ढेरों शुभकामनाएं | आज ये विषय जिसके सन्दर्भ में कुछ लिखने जा रहा हूँ मैं मानता हूँ की मुझे लिखने का सामर्थ्य श्री कृष्ण ही प्रदान करें |
मित्रों हम कृष्ण जन्म की कथा के लिए महर्षि वेदव्यास रचित एवं भगवान नारायण के वाग्मय स्वरुप श्रीमद भागवत की ओर चलते है |
          पहले मैं इसकी पृष्ठभूमि के लिए श्रीमद भागवत जी के स्वरुप की बात करना चाहूँगा | श्रीमद भागवत भगवान श्री कृष्ण का संपूर्ण स्वरुप है | प्रथम स्कंध से लेकर बारहवें स्कंध तक भगवान का संपूर्ण स्वरुप है | भगवान राम का अवतरण रामचरित मानस में बालकाण्ड में ही हो जाता है जब कि भगवान श्री कृष्ण का अवतरण नो स्कंध के बाद दशवें स्कंध में होता है | उसके मर्म को समझने का प्रयास करें तो जब तक साधक परिपूर्ण नहीं हो तब तक पूर्ण पुरुषोत्तम की प्राप्ति संभव नहीं है | नवधा भक्ति से परिपूर्ण साधक या तो नव मास की भक्ति रुपी सगर्भावस्था ये दोनों चीजें साधक को परिपक्व बनाती है साथ ही देखें तो दशमस्कंध श्रीमद भागवत का ह्रदय है और भगवान ह्रदय में प्रगट होते है | जब तक ह्रदय वेणु के समान खाली नहीं होता तब तक भगवान श्री कृष्ण उसे स्वीकार नहीं करते भागवत में वेणु गीत के द्वारा गोपियों ने भगवान की सुंदर स्तुति करी है|
          वेणु प्रभु को प्रिय क्यूँ है उसको यदी समझा जाएँ तो वेणु में कोई रूकावट नहीं है कोई रोध नहीं है | कोई कपट मन में नहीं रहता मन वेणु की तरह निर्मल एवं मधुर होता है तभी भगवान के अधरों की प्राप्ति होती है और मधुर स्वरगान बजता है |

          जब पृथ्वी पर पाप बढ़ा पाप के भार से भारी पृथ्वी गौ का स्वरूप लेकर देवताओं के पास जाती है| जब हमारा मन भी पाप के किसी बोझ से भारी लगे तो हमें गौ अर्थात हमारी इन्द्रियों को अंतर्मुख करके अपने ह्रदय में स्थित परमात्मा का ध्यान करना चाहिए और तभी जो आवाज आत्मदेव से आती है वो ही आकाशवाणी है वो ही प्रभु की वाणी  है |
          भगवान ने सान्तवना देते हुए कहा की मैं पृथ्वी पर भुपराग और भू – पराग हरने आऊंगा |
यहाँ दो शब्द है भू – पराग और भूप राग उसका अर्थ ये है कि भगवान पृथ्वी के बोझ का मतलब पाप को हरेंगे और राजाओं के  मिथ्याभिमान को नष्ट करेंगे |
मित्रों यह कथा की चर्चा करने का मेरा यह उद्देश्य भी है कि भूप राग नष्ट हो | आज भी हमारी पृथ्वी ऐसे भार से आतंकित है |
प्रभु का व्यवहार देखे तो सबको साथ में लेकर चलते है | भगवान चन्द्र वंश में प्रगट हो रहे थे इसीलिए चन्द्रमा की पत्नी रोहिणी एवं वासुदेव जी की पत्नी रोहिणी है भगवान रोहिणी नक्षत्र में प्रगट हुए मध्य रात्रि में प्रगट हुए भगवान के आने से पूर्व भक्त को माया का सामना करना है इसीलिए भगवान श्रीमद भगवद्गीता में कहते है की जो मुझे मेरी माया से परे जानता है वोही मुझे प्राप्त कर सकता है |
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के बारे में जीतना कहा जाये कम है |

“असितगिरी समं  स्यात कज्जलं सिन्धु पात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी |
लिखती यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामिश पारं न याति  ||”

हे इश्वर आपकी गर्भस्तुति द्वारा सभी देवताओं ने आपकी हर लीलाओं को सत्यवर्णित किया है आप सम्पूर्ण सत्य हो आप पूर्ण पुरुषोत्तम हो आपके चरणों में कोटि कोटि वंदन|

“सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादी हेतवे |
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुम: ||”

सत्य स्वरुप तीनो ताप को नाश करने वाले श्री कृष्ण आपको श्री राधा जी सहित प्रणाम करता हूँ |
आओ मिलकर प्रभु से प्रार्थना करे की हे पुश्निगर्भ हे उपेन्द्र हे पुराणपुरुषोत्तम फिर एक बार आपके अवतरण की ज़रूरत हे....

                                                    जय श्री कृष्णा   
Wednesday, 25 May 2016 5 comments

“सामर्थ्य और विवेक”




गोस्वामी श्री तुलसीदास  जी बहुत दीर्घद्रष्टा थे | जैसे – जैसे श्री रामचरितमानस का मनन करते हैं तभी उनकी यह सोच नजर के सामने आती है |

          श्री पवन पुत्र अतुलितबल के स्वामी हनुमान जी महाराज की शक्ति की बात करते है तब यह कहना उचित रहेगा की श्री हनुमान जी परम विवेकी थे तभी बल उनको शोभा देता था |

          हनुमान जी के बाल्यकाल की कथा की और द्रष्टि करे तो पता चलेगा की बहुत शक्ति थी परन्तु सही इस्तेमाल नहीं हो रहा था उसी वजह से बचपन मैं ही ऋषि द्वारा उन्हें दंडित होना पड़ा | ऋषिवर के श्राप की वजह से उन्हें अपनी शक्तियों की विस्मृती हो गई थी | जब श्री सीता माता को खोज करने के लीये जाना पड़ा तब ऋक्षराज श्री जाम्बवान जी ने उन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान कराया |

कहई रीछपति सुनु हनुमाना | का चुप साधि रहेउ बलवाना ||
पवन तनय बल पवन सामना | बुदधि बिबेक बिज्ञान निधाना ||

बहुत की सूक्ष्मता से श्री जाम्बवान जी के द्वारा गोस्वामी जी बल और विवेक की बात करते है | सामर्थ्य तभी शोभा देता है जब विवेक होता है | बिना विवेक बल मनुष्य को  गलत दिशा मैं ही ले जाता है |

जाम्बवान जी सब से बुजुर्ग अनुभव सिद्ध तपस्वी थे इसी लिए विवेक की जागृति कराने में समर्थ थे |
          गोस्वामी जी इस छोटे किन्तु महत्वपूर्ण प्रसंग द्वारा आज के समाज को आज के जुनूनी युवाओं को यही सन्देश दे रहे है कि बलवान बनो बेहद जरुरी है पर जाम्बवान जैसे विवेकी पुरुष से विवेक की जागृति भी करो जब तक युवा विवेकी नहीं होगा समाज दिशा भ्रष्ट ही रहेगा | यह बात बड़ी जिम्मेदारी से लिख रहा हूँ आज जब बड़े बड़े समाज के युवा पुरे समाज को अन्धाधुंधी की दिशा मे  ले जा रहा है तब सही मायनों में मुझे श्री गोस्वामी जी के  शब्द चरितार्थ होते दिख रहे है | की सामर्थ्य तभी शोभा देता है जब विवेक रूपी ज्ञान सम्मिलित होता है |

          आज भी हर समाज से युवाओं को सही रास्ता दिखाने के लिए जाम्बवान जी को आना पड़ेगा | तभी आज समाज के युवाओं में बल के साथ विवेक की जागृति होगी और बल शोभायमान होगा |
“जय श्री राम”




 
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