Tuesday, 9 February 2016

मित्रता “संबंधो का सार”


मित्रों काफी अरसे  के बाद फिर से एक विषय के साथ आपसे मिलने का मौका मिल रहा है |

     मित्रों आज विषय ही ऐसा है की कलम भी ख़ुशी से मित्रता निभा रही है| जीवन में सारे संबंधों का अनुभव मित्रता के आगे छोटा हो जाता है |

     मित्रता कैसी होनी चाहिए मित्र कैसा होना चाहिए यदि इस बातों के लिए कोई उदाहरण देना है तो रामचरित मानस में श्री राम और सुग्रीव की मित्रता और श्रीमद भागवत जी मे श्री कृष्ण और श्री सुदामा जी की मित्रता ............

श्री राम और सुग्रीव की मित्रता जब होती है तब के सभी पहलुओं से देखे तो श्री हनुमान जी द्वारा मित्रता का प्रस्ताव रखा जाता है हनुमान का अर्थ है अटल विश्वास और जब दोनों को जोड़ने वाला विश्वास हो तो संधि में कोई कमी नहीं रहती है | जब मित्रता होती है तो दोनों और से दोनों की पूरी कथा का विगत सुनाया जाता है जब मित्रता दुःख को मिटाने के उद्देश्य से होती है तो उसमे और सच्चाई बढती है आखिर में अग्नि को साक्षी बनाया जाता है इस प्रसंग को यदि मै मेरे दृष्टिकोण से देखता हूँ तो लगता है कि अग्नि दो काम करती है एक अपने आप में जो बुरा है कच्चा है उसे जलाकर समा लेती है और सोना जैसे निखरता है उसी तरह पवित्रता देती है | अग्नि यहाँ प्रत्यक्ष साक्षी है अतुट और निस्वार्थ मैत्री की ऐसी मित्रता मित्रों के हर प्रकार  के कष्ट को मिटा देती है |

     दूसरा जो उदहारण है वो है श्री कृष्ण और श्री सुदामा जी का मै इस प्रसंग का वर्णन कैसे करूँ इतना समर्पण इतना पवित्र भाव शायद ऐसी मित्रता सिर्फ शिव और विष्णु की ही हो सकती है | सुदामा का श्री कृष्ण के प्रति ईश्वरत्व का भाव है वो मित्र का जप और ध्यान करते रहते है और श्री कृष्ण जब श्री सुदामा जी को मिलते है तब एक महान तपस्वी जैसे मिला हो और उनकी भक्ति से पवित्रता से वो खुद उनकी पूजा करने लगते है त्रिभुवन स्वामी खुद श्री सुदामा जी की चरण वंदना करते है | और मित्र को कुछ मांगना नहीं पड़ता उनके भाग्य की रेखाओं में लिखा “श्री क्षय:” मिटाकर “श्री यक्ष:” लिख देते है | कुबेर भी ईष्र्या करने लगे इतना वैभव भगवान श्री सुदामा जी को दे देते है |


“जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी | तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ||
   निज दुःख गिरि सम रज करि जाना | मित्रक दुःख रज मेरु समाना ||”

श्री राम जी सुग्रीव से मित्रता करके सारे दुःख हर लेते है और उसी प्रकार से श्री कृष्ण भी श्री सुदामा जी के सारे दुःख हर लेते है |

इस पवित्र मित्रता के लिए और क्या लिखू शादी के पवित्र रिश्ता जब जुड़ता है तब सप्तपदी मतलब सात वचन जीवन के दिलाए जाते है उसमे भी आखिर में मित्रता ही आती है

|| ॐ सखे सप्तपदी भव ||




      

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