गोस्वामी श्री तुलसीदास जी बहुत दीर्घद्रष्टा थे | जैसे – जैसे श्री
रामचरितमानस का मनन करते हैं तभी उनकी यह सोच नजर के सामने आती है |
श्री
पवन पुत्र अतुलितबल के स्वामी हनुमान जी महाराज की शक्ति की बात करते है तब यह
कहना उचित रहेगा की श्री हनुमान जी परम विवेकी थे तभी बल उनको शोभा देता था |
हनुमान
जी के बाल्यकाल की कथा की और द्रष्टि करे तो पता चलेगा की बहुत शक्ति थी परन्तु
सही इस्तेमाल नहीं हो रहा था उसी वजह से बचपन मैं ही ऋषि द्वारा उन्हें दंडित होना
पड़ा | ऋषिवर के श्राप की वजह से उन्हें अपनी शक्तियों की विस्मृती हो गई थी | जब
श्री सीता माता को खोज करने के लीये जाना पड़ा तब ऋक्षराज श्री जाम्बवान जी ने
उन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान कराया |
कहई रीछपति सुनु हनुमाना | का चुप साधि
रहेउ बलवाना ||
पवन तनय बल पवन सामना | बुदधि बिबेक बिज्ञान
निधाना ||
बहुत की सूक्ष्मता से श्री जाम्बवान जी के द्वारा
गोस्वामी जी बल और विवेक की बात करते है | सामर्थ्य तभी शोभा देता है जब विवेक होता
है | बिना विवेक बल मनुष्य को गलत दिशा
मैं ही ले जाता है |
जाम्बवान जी सब से बुजुर्ग अनुभव सिद्ध तपस्वी थे इसी
लिए विवेक की जागृति कराने में समर्थ थे |
गोस्वामी
जी इस छोटे किन्तु महत्वपूर्ण प्रसंग द्वारा आज के समाज को आज के जुनूनी युवाओं को
यही सन्देश दे रहे है कि बलवान बनो बेहद जरुरी है पर जाम्बवान जैसे विवेकी पुरुष
से विवेक की जागृति भी करो जब तक युवा विवेकी नहीं होगा समाज दिशा भ्रष्ट ही रहेगा
| यह बात बड़ी जिम्मेदारी से लिख रहा हूँ आज जब बड़े बड़े समाज के युवा पुरे समाज को अन्धाधुंधी
की दिशा मे ले जा रहा है तब सही मायनों
में मुझे श्री गोस्वामी जी के शब्द
चरितार्थ होते दिख रहे है | की सामर्थ्य तभी शोभा देता है जब विवेक रूपी ज्ञान
सम्मिलित होता है |
आज भी
हर समाज से युवाओं को सही रास्ता दिखाने के लिए जाम्बवान जी को आना पड़ेगा | तभी आज
समाज के युवाओं में बल के साथ विवेक की जागृति होगी और बल शोभायमान होगा |
“जय श्री राम”


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