Saturday, 9 January 2016 3 comments

“लक्ष्मण रेखा”





नमस्कार मित्रो एक नए विषय के साथ आज फिर मिलना हो रहा है, लक्ष्मण रेखा प्रसंग से कुछ बात करना चाहता हूँ |
      अरण्य कांड में जब माता सीता का हरण करने हेतु रावण मारीच को मायावी मृग बनकर श्री राम जी और लक्ष्मण जी को दूर ले जाने की बात करता है तब बहुत तर्क वितर्क के बाद अपना उद्धार श्री राम के हाथों से करवाने हेतु इस प्रस्ताव को मारीच स्वीकार कर लेता है और उस प्रकार से अपना स्वरुप बदल कर स्वर्ण मृग बनता है |
      माता सीता उसे पाने हेतु श्री रामजी को अनुरोध करते है और श्री रामजी मृग के पीछे जाते है, जब दूर जाकर मृग को अपने तीक्षण बाण से भेदते है तब बहुत ही बड़ी आवाज में ‘लक्ष्मण’ करके मारीच आवाज लगाता है आवाज सुनकर माँ सीता जी व्यथित हो जाते हें और लक्ष्मण जी को उनकी रक्षा हेतु भेजते है | जब लक्ष्मण जी वहां से निकलते है तब प्रभु श्री राम का स्मरण करके अपने बाण से एक रेखा खींचते है (उसी रेखा को लक्ष्मण रेखा अंकित किया गया है) यहीं से हमारी बात शुरू होती है |
      यहाँ श्री लक्ष्मण जी रेखा खींचते हुए माँ सीता को कहते है कि माता इस रेखा के भीतर कोई नहीं आ पायेगा, पर आप कहीं भी जा पाएंगी किन्तु कृपया जब तक हम न आएं आप इस रेखा का उलंघन मत कीजीयेगा | रावण उसी वक्त सन्यासी स्वरुप में आता है और माँ उनको भिक्षा देने हेतु उस रेखा का उल्लंघन करते हे तब सन्यासी रूप में आए हुए  उस भेडिये रावण को अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त होती है यहां महाबली रावण के लिए गोस्वामी जी ने भेडिये शब्द का प्रयोग बहुत सोचकर किया है |

सो दससीस स्वान की नाई | इत उत चितइ चला भड़ीहाई||
इमि कुपंथ पग देत खगेसा | रह न तेज तन बुधि बल लेसा ||

      मेरा उद्देश्य सिर्फ श्री रामचरित मानस की कहानी सुनाना नहीं है | किन्तु यह मानस समाज जीवन से कितना जुड़ा है और कितना दूरदर्शी विचार रखताहै यह दिखाना है | गोस्वामी जी इस प्रसंग में आज के परिपेक्ष्य में यह कहना चाहते है कि रावण रूपी भेड़िया आज भी हमारे समाज में मौजूद है आज एक नहीं ऐसे अनेक रावण सीता माता का हरण करने उन्हें पतित करने घूम रहे है |
      तभी यह लक्ष्मण रेखा का अर्थ समझना जरुरी बनता है | लक्ष्मण रेखा सही में हमारी मर्यादा को दर्शाती है जब-जब हमारी मर्यादा एक रेखा का उलंघन करती है तब – तब ऐसे भेडियों को अपना स्वरुप दिखाने का अवसर मिलता है |
      लक्ष्मण जी यहाँ पर भी यही बात कहते है की इस रेखा के भीतर कोई नहीं आ पायेगा | आज हमारे समाज को भी स्वयं अपनी लक्ष्मण रेखा तय करनी होगी, में इससे किसी स्वंत्रता पर रोक करने की बात कभी नहीं कर रहा हूँ परन्तु मेरा उद्देश्य यह है की एक मर्यादा की रेखा को पार करने से माता सीता भी अपने आप को हरण होने से नहीं बचा पाई थी |
      तो फिर क्यूँ हम यह बात अपने जीवन में चरितार्थ नहीं कर सकते हमें किसी लक्ष्मण की जरुरत नहीं है कि जो हमें सुचितार्थ करे कि यह रेखा है परन्तु अपने आप को समझकर हमें खुद हमारी रेखा तय करनी होगी इन भेडियों से बचने के लिए उन्हें अपनी रेखा में रखना होगा तभी कलियुग के रावणों से हमारी रक्षा होगी |
      लक्ष्मण रेखा को सही अर्थ में समझकर हमें अपने जीवन की लक्ष्मण रेखा तय करनी होगी और रावण को मात देनी होगी |
और विचारों के साथ मिलते रहेंगे
      “जय श्री राम”         


Tuesday, 5 January 2016 8 comments

‘’अहल्या’’




अहल्या शब्द सुनते ही हमारे मन में रामायण स्फुरित होता है | मुझे आज यह कहते हुए गर्व है कि मुझे ऐसे विद्वान आचार्य की संस्कृति मिली है जो की हर एक बात को आध्यात्मिक और यौगिक रूप से समझाकर समाज जीवन को कैसे उन्नत किया  जाए उसकी चिंता में शायद चिंता शब्द उचित नहीं है क्यूंकि यदि चिंता होती तो परिणाम नहीं होता इसलिए चिंतन शब्द का प्रयोग उचित रहेगा |

     5000 वर्ष पूर्व का चिंतन कितना उच्च परिणाम दर्शक था जो आज भी हमें प्रेरणा देता रहता है |

गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर |
चरण कमल रज चाहती कृपा करहु रघुबीर ||
                          (संदर्भ श्रीरामचरित मानस) 
     
     कौन थी अहल्या ? क्या थी अहल्या ? क्यूँ अहल्या उपल देह थी ? क्या सही में अहल्या उपल मतलब पत्थर की थी ? ऐसी स्थिति दर्शाकर गोस्वामी जी कुछ और ही कहना चाहते है | यही रामायण के इस प्रसंग को सिर्फ श्रद्धाभाव से पूछा जाए या वर्णन किया जाए तो यही समज में आएगा कि अहल्या ऋषि गौतम के श्राप से  अपने ही आश्रम में पत्थर की मूर्ति बन गई थी जिसको प्रभु श्री राम ने चरणस्पर्श करा के सजीवन मतलब पुनरुद्धार किया और श्री राम जी की दिव्य लीला का दर्शन होगा और यह प्रसंग समापन हो जायेगा तो क्या इस प्रसंग से हम इतना ही दर्शन करेंगे सही अर्थ में ऐसा ही होना था तो प्रभु श्री राम का अवतार लेकर मर्यादापूर्ण जीवन जीकर सन्देश देने का जो प्रयास है वो विफल हो जायेगा |
     यदी आज की परिपेक्ष्य में देखे तो ‘’अहल्या’’ कोई एक नारी नहीं है परन्तु बहुत सारी अहल्या का समूह है जो आज भी हमारे द्वारा कहे जाने वाले विद्वान  चिंतको द्वारा या प्रतिष्ठित लोगों द्वारा उपेक्षित है |

     यदी उसकाल में जब की तब एक मर्यादा का विचार अस्तित्व में था तब मेरे प्रभु श्री राम द्वारा अहल्या का स्वीकार होता है सिर्फ स्वीकार नहीं क्यूंकि श्रीराम स्वीकार करके रुकते नहीं है उनको पद देते है पद देकर सम्मानित करते है |

आज यह क्यूँ संभव नहीं है ? क्यूँ आज समाज इतना शक्तिशाली नहीं है जो ‘’अहल्या’’ को पद दे सके यथायोग्य सम्मान दे सके ? यदी सही अर्थ में गोस्वामी जी को सार्थक करना है उनके सन्देश को रामचरित मानस को सार्थक करना है तो हर समाज में से राम को आज आना पड़ेगा और ऐसी बहुत सारी ‘’अहल्या’’ को पद देना पड़ेगा तभी श्री राम चरित मानस की यह पंक्ति सार्थक होगी |


‘’और विचारों के साथ मिलते रहेंगे‘’
                                                               ‘’जय श्री राम”
 
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